Edit Content

Our Categories

Edit Content

Our Categories

लघु उद्योग शुरू करने सम्बन्धी उपयोगी मार्गदर्शन एवं उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधाएं

Categories

laghuलघु उद्योग एवं इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाला कोई भी छोटा कारखाना लगाने के लिए केन्द्रीय या राज्य सरकार की औपचारिक अनुमति लेने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। परंतु जो छोटे कारखाने ऐसी चीजों का उत्पादन आरंभ करना चाहते हैं जिनके लिए विदेशी पुर्जों की आवश्यकता हो उन्हें अपने उत्पादन के सम्बन्ध में विकास कमिश्नर (लघु उद्योग) की पूर्व स्वीकृति लेनी जरूरी है। इसके अतिरिक्त छोटे कारखानों को राज्य सरकार अथवा स्थानीय संस्थानों के अधिकारियों के द्वारा निर्धारित कारखाना अधिनियम (फैक्ट्री एक्ट), ‘दुकान तथा प्रतिष्ठान अधिनियम’ और नगर निगम तथा कच्चे माल का कोटा देने के संबंध में बनाये गये नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।

लघु उद्योगों का पंजीकरण

यद्यपि लघु उद्योगों का राज्य उद्योग निदेशालय से पंजीकरण जरूरी नहीं है परंतु फिर भी अपने लाभ के लिए SDI से इसको पंजीकृत करवा लेना चाहिए। कुछ निर्धारित वस्तुएं ऐसी हैं जिन्हें बनाने के लिए राज्य सरकार या केन्द्र सरकार से लाईसेंस लेना पड़ता है, इसके अतिरिक्त इस श्रेणी के उद्योगों के लिए सरकार द्वारा कुछ प्रोत्साहन-लाभ का प्रावधान किया गया है।

यह सुविधा उन्हीं लघु उद्योगों को प्रदान की जाती है, जो राज्य उद्योग निदेशालय के द्वारा पंजीकृत होते हैं, चाहे उद्योग पंजीकृत हो या न हो लेकिन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना आवश्यक है, इसलिए SDI में उद्योगों का पंजीकरण करवा लेना चाहिए।

लघु उद्योग का पंजीकरण दो प्रकार से होता है :

(1) सामयिक पंजीकरण

(2) स्थायी पंजीकरण

लघु उद्योगों का सामयिक पंजीकरण इकाई के उत्पादन में आने से पहले कराया जाता है। यह पंजीकरण सर्टिफिकेट प्रारंभ में दो साल के लिए प्रदान किया जाता है। यदि इकाई इस अवधि में उत्पादन में नहीं आ पाती है तो पंजीकरण का नवीकरण सम्बन्धित राज्य उद्योग निदेशालय से करवाया जाता है। यह नवीकरण मात्र छः महीने के लिए किया जाता है। जब इकाई उत्पादन में आ जाती है, तो प्रार्थना-पत्र SDI को देकर स्थायी पंजीकरण करवाया जाता है।

उपयुक्त उद्यम का चुनाव कैसे करें

जिन उद्योग-धन्धों की सहायता से आय बढ़ाने या स्वतंत्र रूप से जीविका कमाने में सहायता मिल सकती है, उनमें से चुने हुए उद्योग-धन्धों की जानकारी इस पुस्तक में दी गयी है। वैसे तो इसमें बताये गये सभी उद्योग-धन्धे मुनाफा दे सकने वाले हैं और देश-विदेशों में लाखों व्यक्ति इन चुने हुए उद्योग-धन्धों से अच्छा लाभ कमा रहे हैं, परन्तु इस संबंध में यह बात भी स्मरण रखने योग्य है कि आजकल प्रायः सभी उद्योग-धन्धों में इतनी प्रतिस्पर्धा चल रही है कि पुराने तथा अनुभवी व्यक्तियों के मुकाबले में जो नये व्यक्ति इस क्षेत्र में उतरते हैं उन्हें अपने व्यवसाय को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ संघर्ष का भी सामना करना पड़ सकता है और इसके लिए अच्छी व्यापारिक सूझ-बूझ की भी आवश्यकता पड़ती है ।

अपने लिए अधिक उपयुक्त सिद्ध हो सकने वाले उद्योग-धन्धे का चुनाव करने के लिए नीचे बताये गये तथ्यों पर भली-भांति विचार कर लेना आपके लिए मार्ग दर्शक सिद्ध हो सकता है :

क) जिन वस्तुओं का आप उत्पादन करना चाहते हैं उनकी बिक्री के लिए आपके आस-पास के क्षेत्र में पर्याप्त सम्भावना है या नहीं ? यदि अपने उत्पादन को आप दूरस्थ स्थानों एवं बाजार में भी बेचना चाहते हैं तो उसके लिए आप समुचित साधन जुटा सकते हैं या नहीं ?

ख) जो उद्योग आप शुरू करना चाहते हैं उसमें अधिक प्रतिस्पर्धा है तो अपने अन्य प्रतिद्वन्दियों के साथ-साथ आप अपना माल सफलतापूर्वक कैसे बेच सकते हैं?

ग) उस उद्योग के लिए आपके पास आवश्यक ‘पावर कनेक्शन’ तथा स्थान की व्यवस्था है या नहीं?

घ) अपने उत्पादन को लाभ सहित तथा जल्दी बेचने के लिए क्या आप उसका मूल्य दूसरे प्रतिद्वन्दियों की तुलना में कुछ कम रख सकते हैं या उनसे बढि़या माल उचित कीमत पर तैयार कर सकते हैं?

च) आपके कारखाने के लिए आवश्यक कच्चा माल आपको पर्याप्त मात्रा में तथा उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सकता है या नहीं?

ऊपर बताये गये तथ्यों के आधार पर तथा अपनी व्यापरिक सूझ-बूझ को उपयोग में लाकर अपने लिए अधिक उपयुक्त सिद्ध हो सकने वाले धन्धे का चुनाव आप सरलतापूर्वक कर सकते हैं।

सरकारी सुविधाएं :

सरकार की औद्योगिक उदार नीति के तहत लघु एवं कुटीर इकाईयों के विकास का विशेष ध्यान रखा गया है। इन इकाईयों को विभिन्न नियंत्रणों एवं कर्मचारी शासन से मुक्त कर दिया गया है। लघु उद्योगों को विकासोन्मुख बनाने के विचार से सरकार द्वारा 846 वस्तुओं का उत्पादन लघु इकाईयों में करने के लिए खास सुरक्षित रखा गया है। इसमें परम्परागत पेशा एवं ग्रामीण शिल्पकारों के कार्य-उपकरण एवं औजारों तथा कला को अनुसंधान के आधार पर विकसित एवं नवीकृत करने का प्रावधान भी है ।

अन्य उपयोगी सुविधाओं का वर्णन निम्नलिखित है :

फैक्ट्री के लिए उपयुक्त स्थान की सुविधा :

विभिन्न राज्यों में ‘उद्योग निदेशक’ के द्वारा प्रमुख नगरों, कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ‘औद्योगिक बस्तियां’ भी स्थापित की गयी हैं जहां लघु उद्योग स्थापित करने के लिए इच्छुक उद्यमियों को कारखाने स्थापित करने के लिए बनी बनायी इमारतें किराये पर उपलब्ध हो सकती हैं।

इसी तरह औद्योगिक क्षेत्रों में प्रत्येक कारखाने के लिए आवश्यकतानुसार अलग-अलग प्लॉट भी आबंटित किये जाते हैं। इन औद्योगिक बस्तियों या प्लॉटों का किराया उनके क्षेत्रफल और उनकी स्थिति के अनुसार अलग-अलग है। सामान्यतः यह किराया बहुत कम होता है। पहले पांच वर्षों का किराया रियायती दर पर देना होता है। कहीं-कहीं राज्य सरकारें औद्योगिक बस्ती के अन्दर कारखाने की इमारत बनाने के लिए पानी, बिजली आदि की सुविधाओं से सम्पन्न प्लॉट भी देती है। औद्योगिक बस्तियों में कारखानों के लिए स्थान प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रार्थना-पत्र, उस राज्य के ‘उद्योग-निदेशक’ को देना चाहिए।

पावर कनेक्शन के लिए किससे सम्पर्क करें?

कारखाना चलाने के लिए लघु उद्योगों को रियायती दर पर बिजली भी दी जाती है। इसके लिए आवश्यक जानकारी, स्थानीय ‘इलॉक्ट्रिक सप्लाई अण्डरटेकिंग’ से मिल सकती है और इसके लिए आवश्यक प्रार्थना पत्र ‘डायरेक्टर आफ इण्डस्ट्रीज’ से स्वीड्डत कराकर भेजना चाहिए ।

लघु उद्योगों के लिए ऋण की सुविधाएं :

चूंकि लघु उद्योग स्थापित करने एवं सुचारु रूप् से चलाने के लिए साख-ऋण की अहम भूमिका है। लघु उद्योगों को आसान शर्तों एवं कम ब्याज-दर पर ऋण उपलब्ध न हो पाने के फलस्वरूप कभी-कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त बहुत बार वित्तीय संस्थाओं के द्वारा विलम्ब से ऋण प्रदान किया जाता है या अपर्याप्त ऋण प्रदान कराया जाता है। इन समस्याओं को मद्देनजर रखते हुए सरकार द्वारा ‘भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक’ की स्थापना की गयी है ।

यह मुख्य रूप् से वित्तीय संस्थाओं को ऑटोमेटिक रिफाइनान्स स्कीम या नार्मल रिफाइनान्स स्कीम के तहत फण्ड प्रदान करता है। भारतीय लघ उद्योग विकास बैंक के द्वारा खास नई सुविधाएं, जैसे – सिंगल विण्डो कन्सेप्ट के तहत कम्पोजिट लोन राज्य वित्तीय निगमों की अंतः संरचना को सुदृढ़ बनाने के लिए रियायती ऋण तथा नियोगी सेवा का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त और कई योजनाओं के अन्तर्गत लघु उद्योगों को या तो सीधे भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक के द्वारा या राज्य वित्तीय निगमों और व्यवसायिक बैंकों के द्वारा ऋण प्रदान किया जाता है, जिसका विवरण आगे दिया गया है।

साधारणतः ऋण दो प्रकार के होते हैं :

 (a) सावधिक ऋण और (b) कार्यशील पूंजी ऋण

सावधिक ऋण की आवश्यकता कारखाना स्थापित करने के लिए होती है। यह ऋण कारखाने की अचल सम्पत्ति जैसे जमीन, मकान, मशीन, इत्यादि के ऊपर लागत के आधार पर दिया जाता है। यह ऋण वित्तीय संस्थाओं के द्वारा कारखाने की अचल सम्पत्ति को गिरवी रखकर प्रदान किया जाता है।

कार्यशील पूंजी ऋण की आवश्यकता उद्योग को सुचारु रूप से चलाने के लिए होती है। यह ऋण व्यवसायिक बैंकों के द्वारा कारखाने की चल सम्पत्ति जैसे – कच्चा माल, तैयार वस्तु तथा सेल्स क्रेडिट के मद में गिरवी के आधार पर कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट तथा बुकडेब्ट के रूप में दिया जाता है। सावधिक ऋण मुख्य रूप से राज्य वित्तीय निगम के द्वारा प्रदान किया जाता है। वित्तीय निगम भारत के करीब-करीब सभी राज्यों में है। यह वित्तीय निगम सम्बन्धित राज्य सरकार का उपक्रम होता है।

जिन राज्यों में वित्तीय निगम का गठन नहीं किया गया है, उन राज्यों में सावधिक ऋण सम्बन्धित राज्य औद्योगिक विकास निगम के द्वारा दिया जाता है। कार्यशील पूंजी ऋण व्यवसायिक बैंक के द्वारा दिया जाता है। ऐसे व्यवसायिक बैंक सावधिक ऋण भी दे सकता है। लेकिन फिर भी साधारणतया बैंकों के द्वारा कार्यशील पूंजी ऋण ही प्रदान किये जाते हैं। सरकार की ओर से लघु उद्योगों को जिन मुख्य-मुख्य स्रोतों से ऋण मिल सकता है, उनके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी नीचे दी जा रही है।

(क) राज्य सरकारों से मिल सकने वाला ऋण :

सामान्यतः लघु उद्योगों को उनसे संबंधित राज्य के ‘डायरेक्टर आफ इण्डस्ट्रीज’ या उनके अधीन ‘डिस्ट्रिक्ट इण्डस्ट्रीज ऑफिसर’ के कार्यालय से, सहायता अधिनियम के अंतर्गत निम्न शर्तों पर ऋण मिल सकता है :

ब्याज की दर :

लघु उद्योगों को दिये जाने वाले उपर्युक्त ऋण पर ब्याज की दर काफी कम रखी गयी है जो समय के अनुसार घटती बढ़ती रहती है।

ऋण सम्बन्धी अन्य जानकारी :

1. इस ऋण की अदायगी अधिकतम 10 वर्ष में की जा सकती है।

  1. कुछ राज्यों में ‘डिस्ट्रिक्ट इण्डस्ट्रीज ऑफिसर्स’ अथवा जिलाधीशों को 25 हजार रुपये तक दे सकने का अधिकार दे दिया गया है।
  2. औद्योगिक सहकारी संस्थाओं को उनके साधनों के विकास के लिए सहायता प्रदान करने के लिए उद्देश्य से केन्द्रीय सरकार उन सहकारी संस्थाओं की पूंजी के 75 प्रतिशत भाग तक के बराबर रकम, द्विवर्षीय ऋण के रूप में दे सकती है। शेष रकम या तो राज्य सरकार से ऋण के रूप में मिल सकती है अथवा संस्था को स्वयं उसकी व्यवस्था करनी होती है।

(ख) ‘राजकीय वित्त निगम अधिनियम’ के अन्तर्गत मिल सकने वाला ऋण :

‘राजकीय वित्त निगम अधिनियम 1951’ के अन्तर्गत, मझौले और छोटे उद्योगों को ‘दीर्घावधि’ और ‘मध्यावधि’ ऋण देने के लिए, विभिन्नि राज्यों में ‘वित्तनिगम’ स्थापित किये गये हैं – इनसे ऋण लेने के लिए निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

(1) राजकीय वित्तनिगम: राज्य सरकारों के एजेन्टों के रूप में छोटे उद्योगों को रुपया उधार देने के अतिरिक्त, अपनी पूंजी में से उन्हें दीर्घावधि, मध्यावधि और अल्पावधि ऋण देते हैं।

(2) ये निगम, ऋणों पर सामान्यतः 12 से लेकर 20 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज लेते हैं। वैसे ब्याज की दरें, विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हैं।

(3) कई राज्यों में ये वित्त निगम, ठीक समय परऋण की अदायगी कर देने वालों को, ब्याज में 0.5 प्रतिशत वार्षिक छूट देते हैं।

 

(ग) स्टेट बैंक आफ इण्डिया की ऋण योजना :

लघु उद्योगों को ऋण देने के विचार से ‘स्टेट बैंक आफ इण्डिया’ ने भी एक ऋण योजना’ आरम्भ की है – यह योजना 1953 के आरम्भ में परीक्षण के रूप में चुने हुए 6 नगरों में आरम्भ की गयी थी, किन्तु अब इस बैंक की सभी शाखाएं इस योजना के अनुसार काम करने लगी है। इस योजना के अंतर्गत सुविधा के विचार से समस्त देश को इन चार क्षेत्रों में बांटा गया है –   1) कलकत्ता, 2) मुम्बई, 3) चेन्नई और 4) दिल्ली

इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे केन्द्र चुने गये हैं जहां यह योजना गहन रूप से चलायी जा रही है।

इस योजना के संबंध में मुख्य-मुख्य जानकारी नीचे दी जा रही है :

1)लघु उद्योगपतियों को अपनी ऋण सम्बन्धी पूरी आवश्यकताओं के लिए अब से केवल एक ही ऋणदात्री संस्था के पास जाना होगा, अलग-अलग संस्थाओं के पास नहीं ।

2)ऋण लेने वाला लघु उद्योगपति, स्टेट बैंक आफ इण्डिया के एजेण्ट को प्रार्थना पत्र दे सकता है। यदि उसका कारखाना सहकारिता के आधार पर चलता हो तो ऋण के लिए उसे

किसी ‘सहकारी बैंक’ को अपना आवेदनपत्र भेजना चाहिएµयह स्थानीय ‘ऋणदात्री संस्था’ अथवा ‘बैंक’ इस आवेदन पत्र को प्राप्त करके, उस पर स्वयं कार्यवाही करेगा या उस आवेदन-पत्र को उपयुक्त संस्था अथवा संस्थाओं के पास भेज देगा। वास्तव में ये सभी ऋणदात्री संस्थाएं एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करती हैं ।

3) ऊपर बतायी गयी ‘ऋण योजना’ के अन्तर्गत स्टेट बैंक की कार्य प्रणाली को भी काफी उदार बना दिया गया है और अब यह सम्भव हो गया है कि छोटे कारखानों में काम आने वाले कच्चे काल तथा उससे तैयार हुए पक्के-माल अथवा अर्द्ध तैयार माल’ को अपने ताले के अन्तर्गत बंद करके, ‘फैक्ट्रीटाइप बेसिस’ पर उन्हें ऋण दे सकता है। उचित मामलों में यह माल यातायात की अवस्था में होने पर भी ऋण दिया जा सकता है।

4) स्टेट बैंक आफ इण्डिया ने ‘राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड से भी एक करार किया है। इस नियम की सहायता से जिन लघु उद्योगों को माल खरीदने वाले सरकारी विभागों के आर्डर मिलते हैं, वे लघु उद्योग कच्चे माल की लागत के बराबर तक रकम स्टेट बैंक आफ इण्डिया से ऋण ले सकते हैं।

घ) ऋण संबंधी अन्य सरकारी योजनाः

1. साधारणतः

व्यापारिक बैंकों तथा निजी ऋणदाता संस्थाओं को प्रोत्साह न देने के लिए भी भारत सरकार ने एक योजना बनाई है। इस येाजना का मुख्य उद्देश्य लघु उद्योगों को ऋण देने के संबंध में ‘ऋणदात्री संस्थाओं’ को प्रोत्साहन देना है। जो बैंक लघु उद्योगों को ऋण देते हैं, उन्हें ऋण चुकता न होने के खतरे से बचाने के लिए इस योजना का में कुछ सीमा तक सुरक्षा की व्यवस्था रखी गयी है। इस योजना के अनुसार इस प्रकार की हानि को ऋण देने वाला बैंक तथा भारत सरकार बांट लेंगे।

अभी केवल कुछ चुनी हुई ऋणदात्री संस्थाओं अथवा बैंकों, द्वारा दिये गये ऋणों पर ही उपर्युक्त गारन्टी दी जाती है। इन बैंकों तथसा ऋणदात्री संस्थाओं की सूची में बहुत से ‘अनुसूचित बैंक’ या राजकीय सहकारी बैंकों, तथा ऋण देनेवाली संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य बैंक भी लघु उद्योग को दिये गये ऋणों पर इस गारन्टी सुविधा का लाभ उठा सकते हैं, बशर्ते कि ऋण के कम से कम २५ प्रतिशत भाग में, उपरोक्त सूची में शामिल किसी बैंक अथवा ऋणदात्री संस्था का योग हो। कारखाने की इमारत, मशीनों या कार्यकारी पूंजी के लिए दिए जाने वाले ऋणों पर भी गारन्टी दी जा सकेगी। इस गारन्टी की एक आवश्यक शर्त यह है कि ऋण की रकम उसी कार्य पर खर्च की जाए, जिसके लिए वास्तव में ऋण लिया गया हो।

उपयुक्त गारन्टी, लघु उद्योग को दिये गए उन ऋणों पर दी जाती है जो बैंक द्वारा मांगे जाने पर वापिस मिल सके अथवा जिनकी अवधि 10 वर्ष से अधिक न हो तथा जिनकी स्वीकृति 1 जुलाई 1960 या उसके बाद दी गयी हो।

नोट: 1 जुलाई 1960 के पहले स्वीकृत किये गए उन ऋणों पर भी यह गारन्टी मिल सकती है।

जिनको इस तिथि के पश्चात सामान्य अथवा सही रूप से दोबारा स्वीकृति दी गयी हो या जिनकी अवधि बढ़ा दी गयी हो – ऐसे मामलों में गारन्टी देने से पहले यह अवश्य देखा जायेगा कि संबद्ध लघु उद्योग द्वारा पिछले ऋण ठीक समय पर चुकाये गए हैं अथवा नहीं।

ऋण मंजूर करने के पूर्व या उसके पश्चात् ‘प्रार्थना-पत्र’ केवल    1 वर्ष के गारन्टी के लिए लेना चाहिए, इसके बाद भी यदि आवश्यकता हो तो इस गारन्टी को एक बार में 6 महीने या उससे विभाजित होने वाली अवधि के लिए बढ़वाया जा सकता है, परन्तु ऋण की रकम लिये जाने की तिथि से, यह अवधि 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

  1. बीज धन योजना :

बीज-धन योजना लघु उद्योग विकास बैंक के द्वारा प्रायोजित की जाती है। इस योजना का संचालन राज्य के सर्वाधिक ऋण देने वाली संस्थाओं के द्वारा किया जाता है। इस योजना के तहत उदार शर्तों पर उन नये उद्यमियों को वित्तीय सहातया दी जाती है जो उद्योग स्थापित करके सफल संचालन करने में सक्षम होते हैं, लेकिन उनके पास प्रर्वतक पूंजी लगाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रहते हैं। यह वित्तीय सहायता ब्याज-रहित दी जाती है। सिर्फ 1 प्रतिशत की दर से नाममात्र सेवा शुल्क लिया जाता है। इस योजना के अन्तर्गत मुख्यतः उन उद्यमियों को सहायता प्रदान की जाती है जो तकनीकी या व्यावसायिक योग्य या दक्ष या अनुभवी हों ।

3. महिला–उद्यम निधि:

महिलाओं के समेकित विकास को ध्यान में रखते हुए लघु उद्योग विकास बैंक के द्वारा गुन स्कीम का समायोजन किया गया है इसका कार्यान्वयन किसी व्यवसायिक बैंक के द्वारा किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत प्रतिभा-सम्पन्न नयीं महिला उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है ।

Niir Project Consultancy Services (NPCS)

can provide Startup Book on

Laghu V Kutir Udyog (Small Scale Industries) in Hindi Language

For more details visit us at:

http://goo.gl/fQk5Ur      

 

Contact us:

Niir Project Consultancy Services

106-E, Kamla Nagar, Opp. Spark Mall,

New Delhi-110007, India.

Email: npcs.ei@gmail.com , info@entrepreneurindia.co

Tel: +91-11-23843955, 23845654, 23845886, 8800733955

Mobile: +91-9811043595

Fax: +91-11-23841561

Website :

http://www.niir.org

http://www.entrepreneurindia.co

 

 

Tags

स्वरोजगार बेहतर भविष्य का नया विकल्प, अमीर बनने के तरीके, अवसर को तलाशें, आखिर गृह और कुटीर उद्योग कैसे विकसित हो, आधुनिक कुटीर एवं गृह उद्योग, आप नया करोबार आरंभ करने पर विचार कर रहे हैं, उद्योग से सम्बंधित जरुरी जानकारी, औद्योगिक नीति, कम पूंजी के व्यापार, कम पैसे के शुरू करें नए जमाने के ये हिट कारोबार, कम लागत के उद्योग, कम लागत वाले व्यवसाय, कम लागत वाले व्यवसाय व्यापार, कारोबार बढाने के उपाय, कारोबार योजना चुनें, किस वस्तु का व्यापार करें किससे होगा लाभ, कुटीर उद्योग, कुटीर और लघु उद्यमों योजनाएं, कैसे उदयोग लगाये जाये, कौन सा व्यापार करे, कौन सा व्यापार रहेगा आपके लिए फायदेमंद, क्या आप अपना कोई नया व्यवसाय, व्यापारकारोबार, स्वरोजगार, छोटा बिजनेस, उद्योग, शुरु करना चाहते हैं?, क्या आपको आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए, क्या व्यापार करे, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों हेतु स्थापना, छोटा कारोबार शुरु करें, छोटे पैमाने की औद्योगिक इकाइयाँ, छोटे मगर बड़ी संभावना वाले नए कारोबार, छोटे व्यापार, नया कारोबार, नया बिजनेस आइडिया, नया व्यवसाय शुरू करें और रोजगार पायें, नया व्यापार, परियोजना प्रोफाइल, भारत के लघु उद्योग, भारत में नया कारोबार शुरू करना, रोजगार के अवसर, लघु उद्योग, लघु उद्योग की जानकारी, लघु उद्योग के नाम, लघु उद्योग के बारे, लघु उद्योग माहिती व मार्गदर्शन, लघु उद्योग यादी, लघु उद्योग शुरू करने सम्बन्धी उपयोगी, लघु उद्योग सूची, लघु उद्योगों का वर्गीकरण, लघु उद्योगों की आवश्यकता, लघु उद्योगों के उद्देश्य, लघु उद्योगों के प्रकार, लघु उधोग की जानकारी, लघु एवं कुटीर उद्योग, लघु कुटीर व घरेलू उद्योग परियोजनाएं, व्यवसाय लिस्ट, व्यापार करने संबंधी, व्यापार के प्रकार, सुक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्ट अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया स्टैंड अप इंडिया, स्टार्टअप क्या है, स्टार्टअप योजना, स्वरोजगार, स्वरोजगार के अवसर, स्वरोज़गार परियोजनाएं, लघु उद्योगों की सम्पूर्ण जानकारी की किताब, सफल उद्योगों की गाइड, क्या आप खुद का बिज़नस करना चाहते हैं, लघु उद्योगों की विस्तृत जानकारी ,

Contact Form

[contact-form][contact-field label=’Name’ type=’name’ required=’1’/][contact-field label=’Email’ type=’email’ required=’1’/][contact-field label=’Country’ type=’text’ required=’1’/][contact-field label=’Mobile’ type=’text’/][contact-field label=’Website’ type=’url’/][contact-field label=’Comment’ type=’textarea’ required=’1’/][/contact-form]

 

More Posts

Send Us A Message

Contact Form Demo

Send Us A Message

Categories

Welcome to NPCS, your premier industrial consultancy partner. Discover our tailored solutions and global expertise for entrepreneurial success.

Subscribe Now

Don’t miss our future updates! Get Subscribed Today!

Subscription Form

©2024. NPCS Blog. All Rights Reserved. 

Translate »